खुद अपने विभाग और कर्मचारियों की आपूर्ति नहीं कर पा रहा, नागरिक आपूर्ति निगम
उज्जैन। जहॉं एक ओर लॉक डाडन में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगो कि सबसे अहम जरूरतों खाद्यान्न पूर्ति का जिम्मा नागरिक आपूर्ति निगम को सौंपा गया है वहंी एक ओर लोगो कि आपूर्ति करने वाला निगम खुद अपने विभाग और कर्मचारियों की आपूर्ति करने में अक्षम नजर आ रहा है। ऐसी विपरित परिस्थिति में भी अपने कर्म स्थल पर पहुॅंच कर अपने कार्य को अंजाम देने वाले कर्मचारियों के स्वास्थ एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने से नागरिक आपूर्ति निगम उज्जैन पूरी तरह से फैल नजर आ रहा है।
शासन के आदेश की सरे से उडाई धज्जियां- मध्यप्रदेश शासन सामान्य प्रशासन विभाग कि ओर से एक पत्र क्रमांक/साविप्र/कोविड/43/2020 भोपाल दिनांक 29 अपे्रल 2020 के बिन्दु क्रमांक 5 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘‘लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण द्वार जारी दिशा निर्देशों के अनुरूप प्रत्येक कार्यालय को नियमित रूप से सेनेटाईज एवं फ्यूमिगेट किया जावे एवं कार्यालय में प्रत्येक कक्ष में आवश्यकता अनुसार सेनेटाईजर आदि आवश्यक सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित की जावे।’’ लेकिन इसके विपरित नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा इस आदेश की सिरे से धज्जियां उडाते हुए उज्जैन जिला कार्यालय एवं जिले के किसी भी केन्द्र पर इनमें से कोई भी सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई गई है। सूत्रों की माने तो कर्मचारियों द्वारा कई बार इस बारे में जिला प्रबंधक को अवगत भी करवाया गया किन्तु उनके द्वारा इसे गंभीरता से न लेते हुए हर बार टाल दिया अब इससे यही लगता है कि नागरिक आपूर्ति निगम शायद अपने विभाग और कर्मचारियों की भी आपूर्ति करने में अक्षम है।
सोश्यल डिस्टेंसिंग के नाम पर शून्य - उज्जैन के कृषि उपज मंडी स्थित नागरिक आपूर्ति निगम के केन्द्र पर सोश्यल डिस्टेंसिंग का पालन करना दूर की कौडी ही लग रहा है। यहां प्रतिदिन उचित मूल्य दुकान के संचालक, पीडीएस कार्य में लगे ट्रांसपोर्टर, हम्माल और पीडीएस की दुकानों पर खाद्यान्न पहुॅचाने वाले वाहन चालकों का जमावडा लगा रहता है, जिन्हें शायद निगम द्वारा सोश्यल डिस्टेंसिंग के बारे में कभी नहीं कहा जाता है। यह सब एक-दुजे से सट कर बैठे रहते है, जबबि खुद नान के कर्मचारी और अधिकारी भी एक छोटे से कमरे में 3-4 लोग हमेशा बैठे रहते है और खुद ही इस नियम को भी ताक पर रख देते है तो वह उचित मूल्य दुकान के संचालक, पीडीएस कार्य में लगे ट्रांसपोर्टर, हम्माल और पीडीएस की दुकानों पर खाद्यान्न पहुॅचाने वाले वाहन चालकों से इस नियम का पालन करवाएंगे यह तो दूर की कौडी ही है।
उज्जैन में कोरोना का प्रकोप अपने चरम पर है इसके बाद भी निगम द्वारा इस तरह की लापरवाही समझ के परे है। कई वाहन चालक पीडीएस की सामग्री उचित मूल्य की दुकानों पर पहॅुंचा कर आते है जो या तो कंटेंटमेंट एरिया के समीप है या कंटेंटमेंट एरिया में है इसके बावजूद दौबारा निगम में आने पर न तो उनके हाथ सेनेटाईज करने की कोई व्यवस्था है न ही उन्हें कोई दूरी का पालन करने का कहा जाता है, ठीक ऐसे की इन गाडियों में खाद्यन्न लोड करेने वाले हम्मालों में से भी कई हम्माल ऐसे है जो कि संक्रमित क्षेत्र के आस-पास से ही आते है फिर भी उन्हे सेनेटाईज की कोई व्यवस्था नहीं है। अब ऐसे में कोई अपने साथ अनजाने में खतरे को अपने साथ ले आए तो उसके साथ एतिहात बरतनें की भी कोई व्यवस्था शायद नागरिक आपूर्ति निगम के पास नहीं है।
आउट सोर्सिंग कर्मियों के साथ शूद्रो जैसा व्यवहार - पुरातन काल में समाज को 4 वर्णों में विभाजित किया था जिनमें ब्रहाम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र थे, ब्राहम्णों को शिक्षा प्रदान करने का, क्षत्रियों को नगर की सेना में शामिल होने का वैश्यों को व्यपार का अधिकारी प्राप्त था वहीं शूद्रों को इन तीनों वर्गों की सेवा के लिए नियुक्त किया जाता था जिन्हें काम तो समस्त प्रकार के सौंपे जाते थे किन्तु सुविधा के नाम पर कुछ नहीं दिया जाता था, ठीक ऐसी ही स्थिति नागरिक आपूर्ति निगम में आउट सोर्सिंग कर्मचारियों की है जिनसे निगम के नियमित कर्मियों द्वारा समस्त प्रकार के कार्य करवाये जाते है, किन्तु जब इनके द्वारा अपने लिए कोई सुविधा मांगी जाती है तो बस इन्हें ठेंगा दिखा दिया जाता है।
एक ही कार्यालय में रहते हुए नियमित और आउट सोर्सिंग कर्मियों के लिए अलग-अलग नियम अपनाएं जाते है, अभी की परिस्थिति में जहां पुरे प्रदेश में कर्मीयों को अल्टरनेट रूप से (एक दिन छोडक़र) कार्यालय आने के निर्देश है ऐसे में इन सभी कर्मियों को नियमित रूप से कार्यालय आने का कहा जा रहा है साथ ही इसी कार्यालय के कुछ नियमित कर्मी या तो कार्यालय नहीं आ रहे या वर्क फ्राम होम कर रहे है, लेकिन यदि यह आउट सोर्सिंग कर्मी किसी परिस्थितीवश कार्यालय आने में समर्थ नहीं हो पाते है तो उनकी सेलेरी काटने का बोल दिया जाता है। बात सेलेरी की करे तो इन आउट सोर्सिंग कर्मीयों की सेलेरी प्रत्येक माह की 15 तारिख के पूर्व नहीं आती है इस कोरोना की विकट स्थिति में भी जहां मात्र 8-9 हजार कमाने वाले कर्मियों को अपने परिवार के पालन में कठनाई का समाना करना पड रहा है तब भी अभी तक इन कर्मियों की सेलेरी अप्राप्त है और जब भी अधिकारियों से इस संबंध में बात कि जाती है, तो किसी अधिकारी के द्वार कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है। शायद अधिकारियों को लगता है कि यह कर्मी सिर्फ काम के लिए है सुविधा के लिए नहीं। अब देखते है कौन मानवाधिकार या कौन सा कर्मचारी आयोग इनकी सहायता के लिए आगे आता है।
उज्जैन। जहॉं एक ओर लॉक डाडन में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लोगो कि सबसे अहम जरूरतों खाद्यान्न पूर्ति का जिम्मा नागरिक आपूर्ति निगम को सौंपा गया है वहंी एक ओर लोगो कि आपूर्ति करने वाला निगम खुद अपने विभाग और कर्मचारियों की आपूर्ति करने में अक्षम नजर आ रहा है। ऐसी विपरित परिस्थिति में भी अपने कर्म स्थल पर पहुॅंच कर अपने कार्य को अंजाम देने वाले कर्मचारियों के स्वास्थ एवं सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने से नागरिक आपूर्ति निगम उज्जैन पूरी तरह से फैल नजर आ रहा है।
शासन के आदेश की सरे से उडाई धज्जियां- मध्यप्रदेश शासन सामान्य प्रशासन विभाग कि ओर से एक पत्र क्रमांक/साविप्र/कोविड/43/2020 भोपाल दिनांक 29 अपे्रल 2020 के बिन्दु क्रमांक 5 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि ‘‘लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण द्वार जारी दिशा निर्देशों के अनुरूप प्रत्येक कार्यालय को नियमित रूप से सेनेटाईज एवं फ्यूमिगेट किया जावे एवं कार्यालय में प्रत्येक कक्ष में आवश्यकता अनुसार सेनेटाईजर आदि आवश्यक सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित की जावे।’’ लेकिन इसके विपरित नागरिक आपूर्ति निगम द्वारा इस आदेश की सिरे से धज्जियां उडाते हुए उज्जैन जिला कार्यालय एवं जिले के किसी भी केन्द्र पर इनमें से कोई भी सुविधा उपलब्ध नहीं करवाई गई है। सूत्रों की माने तो कर्मचारियों द्वारा कई बार इस बारे में जिला प्रबंधक को अवगत भी करवाया गया किन्तु उनके द्वारा इसे गंभीरता से न लेते हुए हर बार टाल दिया अब इससे यही लगता है कि नागरिक आपूर्ति निगम शायद अपने विभाग और कर्मचारियों की भी आपूर्ति करने में अक्षम है।
सोश्यल डिस्टेंसिंग के नाम पर शून्य - उज्जैन के कृषि उपज मंडी स्थित नागरिक आपूर्ति निगम के केन्द्र पर सोश्यल डिस्टेंसिंग का पालन करना दूर की कौडी ही लग रहा है। यहां प्रतिदिन उचित मूल्य दुकान के संचालक, पीडीएस कार्य में लगे ट्रांसपोर्टर, हम्माल और पीडीएस की दुकानों पर खाद्यान्न पहुॅचाने वाले वाहन चालकों का जमावडा लगा रहता है, जिन्हें शायद निगम द्वारा सोश्यल डिस्टेंसिंग के बारे में कभी नहीं कहा जाता है। यह सब एक-दुजे से सट कर बैठे रहते है, जबबि खुद नान के कर्मचारी और अधिकारी भी एक छोटे से कमरे में 3-4 लोग हमेशा बैठे रहते है और खुद ही इस नियम को भी ताक पर रख देते है तो वह उचित मूल्य दुकान के संचालक, पीडीएस कार्य में लगे ट्रांसपोर्टर, हम्माल और पीडीएस की दुकानों पर खाद्यान्न पहुॅचाने वाले वाहन चालकों से इस नियम का पालन करवाएंगे यह तो दूर की कौडी ही है।
उज्जैन में कोरोना का प्रकोप अपने चरम पर है इसके बाद भी निगम द्वारा इस तरह की लापरवाही समझ के परे है। कई वाहन चालक पीडीएस की सामग्री उचित मूल्य की दुकानों पर पहॅुंचा कर आते है जो या तो कंटेंटमेंट एरिया के समीप है या कंटेंटमेंट एरिया में है इसके बावजूद दौबारा निगम में आने पर न तो उनके हाथ सेनेटाईज करने की कोई व्यवस्था है न ही उन्हें कोई दूरी का पालन करने का कहा जाता है, ठीक ऐसे की इन गाडियों में खाद्यन्न लोड करेने वाले हम्मालों में से भी कई हम्माल ऐसे है जो कि संक्रमित क्षेत्र के आस-पास से ही आते है फिर भी उन्हे सेनेटाईज की कोई व्यवस्था नहीं है। अब ऐसे में कोई अपने साथ अनजाने में खतरे को अपने साथ ले आए तो उसके साथ एतिहात बरतनें की भी कोई व्यवस्था शायद नागरिक आपूर्ति निगम के पास नहीं है।
आउट सोर्सिंग कर्मियों के साथ शूद्रो जैसा व्यवहार - पुरातन काल में समाज को 4 वर्णों में विभाजित किया था जिनमें ब्रहाम्ण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र थे, ब्राहम्णों को शिक्षा प्रदान करने का, क्षत्रियों को नगर की सेना में शामिल होने का वैश्यों को व्यपार का अधिकारी प्राप्त था वहीं शूद्रों को इन तीनों वर्गों की सेवा के लिए नियुक्त किया जाता था जिन्हें काम तो समस्त प्रकार के सौंपे जाते थे किन्तु सुविधा के नाम पर कुछ नहीं दिया जाता था, ठीक ऐसी ही स्थिति नागरिक आपूर्ति निगम में आउट सोर्सिंग कर्मचारियों की है जिनसे निगम के नियमित कर्मियों द्वारा समस्त प्रकार के कार्य करवाये जाते है, किन्तु जब इनके द्वारा अपने लिए कोई सुविधा मांगी जाती है तो बस इन्हें ठेंगा दिखा दिया जाता है।
एक ही कार्यालय में रहते हुए नियमित और आउट सोर्सिंग कर्मियों के लिए अलग-अलग नियम अपनाएं जाते है, अभी की परिस्थिति में जहां पुरे प्रदेश में कर्मीयों को अल्टरनेट रूप से (एक दिन छोडक़र) कार्यालय आने के निर्देश है ऐसे में इन सभी कर्मियों को नियमित रूप से कार्यालय आने का कहा जा रहा है साथ ही इसी कार्यालय के कुछ नियमित कर्मी या तो कार्यालय नहीं आ रहे या वर्क फ्राम होम कर रहे है, लेकिन यदि यह आउट सोर्सिंग कर्मी किसी परिस्थितीवश कार्यालय आने में समर्थ नहीं हो पाते है तो उनकी सेलेरी काटने का बोल दिया जाता है। बात सेलेरी की करे तो इन आउट सोर्सिंग कर्मीयों की सेलेरी प्रत्येक माह की 15 तारिख के पूर्व नहीं आती है इस कोरोना की विकट स्थिति में भी जहां मात्र 8-9 हजार कमाने वाले कर्मियों को अपने परिवार के पालन में कठनाई का समाना करना पड रहा है तब भी अभी तक इन कर्मियों की सेलेरी अप्राप्त है और जब भी अधिकारियों से इस संबंध में बात कि जाती है, तो किसी अधिकारी के द्वार कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती है। शायद अधिकारियों को लगता है कि यह कर्मी सिर्फ काम के लिए है सुविधा के लिए नहीं। अब देखते है कौन मानवाधिकार या कौन सा कर्मचारी आयोग इनकी सहायता के लिए आगे आता है।
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