आचार्यश्री कितनी देर विश्राम करते हैं? क्या वे दिन में भी सोते हैं"?
मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज कहते है कि--
आचार्यश्री की जो चर्या है, बिल्कुल अलग है। वे बहुत कम सोते हैं, अल्प निद्रा लेते हैं, लगभग ढाई घंटा वे विश्राम करते हैं। दस बजे से पहले वे प्रायः शयन नहीं करते, उसके बाद भी मध्य रात्रि में उठकर वे सामायिक करते हैं।
ढाई बजे के बाद मैंने उन्हें कभी सोते हुए नहीं देखा। चाहे कैसा भी विहार हो या वे कितने भी बीमार हों और जहाँ तक दिन में सोने की बात है, मैंने कभी उन्हें सोते हुए नहीं देखा। हाँ, अगर कभी तीव्र ज्वर-ग्रस्त हों तो वे लेटते तो हैं, लेकिन शयन कभी नहीं करते।
वह सतत् अप्रमत्त रहते हैं। यही उनकी जागरूकता का प्रतीक है। योगी का एक लक्षण होता है, जो अल्प भोजन करे, अल्प निद्रा ले, नित्य प्रति जाग्रत रहे।
मुनिश्री प्रमाणसागर जी महाराज कहते है कि--
आचार्यश्री की जो चर्या है, बिल्कुल अलग है। वे बहुत कम सोते हैं, अल्प निद्रा लेते हैं, लगभग ढाई घंटा वे विश्राम करते हैं। दस बजे से पहले वे प्रायः शयन नहीं करते, उसके बाद भी मध्य रात्रि में उठकर वे सामायिक करते हैं।
ढाई बजे के बाद मैंने उन्हें कभी सोते हुए नहीं देखा। चाहे कैसा भी विहार हो या वे कितने भी बीमार हों और जहाँ तक दिन में सोने की बात है, मैंने कभी उन्हें सोते हुए नहीं देखा। हाँ, अगर कभी तीव्र ज्वर-ग्रस्त हों तो वे लेटते तो हैं, लेकिन शयन कभी नहीं करते।
वह सतत् अप्रमत्त रहते हैं। यही उनकी जागरूकता का प्रतीक है। योगी का एक लक्षण होता है, जो अल्प भोजन करे, अल्प निद्रा ले, नित्य प्रति जाग्रत रहे।
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