अत्यल्प समय में आहार चर्या
आचार्य श्री जी की आहारचर्या अत्यल्प समय में संपन्न हो जाती है।नवधाभक्ति पूर्वक श्रावक पड़गाहन करते हैं,तब नीची दृष्टि कर उसके घर आहार को चले जाते हैं।और आधे घंटे में आहार संपन्न कर वापस भी आ जाते हैं। *वह कहते हैं-"शरीर के धर्म को चलाने के लिए खा रहा हूं।मेरे लिए नहीं खा रहा हूं,मुझे तो आत्म साधना करनी है ऐसे भाव होना चाहिए साधु के।"*
ऐसी ही भावना से ही आहार ग्रहण करते हैं।आहार के समय उनकी अनासक्तता देखकर ऐसा लगता है जैसे बोतल में भोजन भरा जा रहा हो।एक बार आहार करना भी श्रमण का एक मूलगुण है उसका ही पालन करने वह चौके में जाते हैं और शीघ्र ही वापस आ जाते हैं।
एक बार मई-जून 1999 कुंडलपुर में आचार्य श्री जी के आहार चल रहे थे।चौके में चार ही लोग थे।एक श्राविका आचार्य श्री जी से *"छैना के रसगुल्ला"* लेने का बार बार निवेदन कर रही थी और गुरुवर बार-बार अंजुलि बंद कर रहे थे।
गुरुवर द्वारा *"रसगुल्ला*" नहीं लिए जाने पर भी कटोरी को वापस रखते समय उस श्राविका की अचानक से प्रशस्त हंसी फूट पड़ी।गुरुवर की प्रश्नवाचक रूप से दृष्टि उस पर पड़ी।वह विनम्रतापूर्वक बोली- *"आचार्य जी हमारे द्वारा बार-बार निवेदन करने पर यदि आप उसे ले लेते हैं तब तो लाभ ही लाभ है, यदि नहीं भी ले तब भी हम चौके वालों को लाभ है।"* इस बार भी गुरुवर ने ऐसा देखा मानो पूछ रहे हो कि- न लेने पर कैसा लाभ? वह बोली- *"गुरुवर आप लीजिए।ऊँ-हूं,आप लीजिए न।ऊँ-हूँ।ऐसा करने पर भले ही आपने उसे नहीं लिया पर जितना समय आपको चौके में रहना था उससे कुछ अधिक देर ठहरने का सौभाग्य तो हम लोगों को मिल गया।तो हुआ न लाभ?"* यह सुनकर आचार्य श्री जी सहित सभी को हंसी आ गई।
*धन्य गुरुदेव को,जो वे सब प्रकार की चाह से परे अनासक्त भाव से अपनी चर्या में रत है।
आचार्य श्री जी की आहारचर्या अत्यल्प समय में संपन्न हो जाती है।नवधाभक्ति पूर्वक श्रावक पड़गाहन करते हैं,तब नीची दृष्टि कर उसके घर आहार को चले जाते हैं।और आधे घंटे में आहार संपन्न कर वापस भी आ जाते हैं। *वह कहते हैं-"शरीर के धर्म को चलाने के लिए खा रहा हूं।मेरे लिए नहीं खा रहा हूं,मुझे तो आत्म साधना करनी है ऐसे भाव होना चाहिए साधु के।"*
ऐसी ही भावना से ही आहार ग्रहण करते हैं।आहार के समय उनकी अनासक्तता देखकर ऐसा लगता है जैसे बोतल में भोजन भरा जा रहा हो।एक बार आहार करना भी श्रमण का एक मूलगुण है उसका ही पालन करने वह चौके में जाते हैं और शीघ्र ही वापस आ जाते हैं।
एक बार मई-जून 1999 कुंडलपुर में आचार्य श्री जी के आहार चल रहे थे।चौके में चार ही लोग थे।एक श्राविका आचार्य श्री जी से *"छैना के रसगुल्ला"* लेने का बार बार निवेदन कर रही थी और गुरुवर बार-बार अंजुलि बंद कर रहे थे।
गुरुवर द्वारा *"रसगुल्ला*" नहीं लिए जाने पर भी कटोरी को वापस रखते समय उस श्राविका की अचानक से प्रशस्त हंसी फूट पड़ी।गुरुवर की प्रश्नवाचक रूप से दृष्टि उस पर पड़ी।वह विनम्रतापूर्वक बोली- *"आचार्य जी हमारे द्वारा बार-बार निवेदन करने पर यदि आप उसे ले लेते हैं तब तो लाभ ही लाभ है, यदि नहीं भी ले तब भी हम चौके वालों को लाभ है।"* इस बार भी गुरुवर ने ऐसा देखा मानो पूछ रहे हो कि- न लेने पर कैसा लाभ? वह बोली- *"गुरुवर आप लीजिए।ऊँ-हूं,आप लीजिए न।ऊँ-हूँ।ऐसा करने पर भले ही आपने उसे नहीं लिया पर जितना समय आपको चौके में रहना था उससे कुछ अधिक देर ठहरने का सौभाग्य तो हम लोगों को मिल गया।तो हुआ न लाभ?"* यह सुनकर आचार्य श्री जी सहित सभी को हंसी आ गई।
*धन्य गुरुदेव को,जो वे सब प्रकार की चाह से परे अनासक्त भाव से अपनी चर्या में रत है।
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